Sanjhi Kala: हरियाणा की पारंपरिक सांझी लोककला

Sanjhi kala (सांझी कला) हरियाणा की एक पारंपरिक लोककला है, जिसमें नवरात्रि के दौरान घर की दीवार पर गोबर और मिट्टी से सांझी माता की आकृति बनाई जाती है। नौ दिनों तक हर शाम इसकी पूजा होती है और दशहरे पर इसका विसर्जन किया जाता है। यह परंपरा मुख्य रूप से महिलाएं और लड़कियां निभाती हैं, और यही इसे हरियाणा की लोक संस्कृति का खास हिस्सा बनाती है।
- सांझी माता को देवी दुर्गा या पार्वती का रूप माना जाता है।
- आकृति पूरी तरह प्राकृतिक चीज़ों – गोबर, मिट्टी, चूना, कालिख और फूलों – से बनती है।
- पहले नवरात्र को सांझी बनती है और साथ में मिट्टी के बर्तनों में जौ बोए जाते हैं।
- दशहरे पर सांझी को उतारकर दीये और जौ के साथ तालाब या नदी में विसर्जित किया जाता है।
- हरियाणा के साथ पंजाब, दिल्ली, ब्रज क्षेत्र और राजस्थान में भी इसके रूप मिलते हैं।
इस लेख में
- Sanjhi kala क्या है?
- सांझी बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री
- सांझी कैसे बनाई जाती है: चरण-दर-चरण
- नौ दिनों की पूजा और दशहरे पर विसर्जन
- सांझी से जुड़ी मान्यताएं और सामाजिक महत्व
- अलग-अलग क्षेत्रों में Sanjhi kala के रूप
- सांझी कला आज: चुनौतियां और संरक्षण
- घर पर सांझी बनाते समय आम गलतियां
- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
- आखिर में काम की बात
Sanjhi kala क्या है?
सांझी एक लोक देवी का नाम है। हरियाणा और पंजाब में शारदीय नवरात्रि को नौराते भी कहा जाता है, और इन्हीं दिनों सांझी माता की पूजा होती है। लोक मान्यता के अनुसार सांझी माता नौ दिनों के लिए अपने मायके आती हैं।
“सांझी” शब्द को “संध्या” यानी शाम से जुड़ा माना जाता है। इसकी वजह यह है कि सांझी की पूजा और उसके गीत आमतौर पर शाम के समय होते हैं। इसलिए यह कला सिर्फ चित्र नहीं, बल्कि एक पूरा सांस्कृतिक अनुष्ठान है।
सांझी बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री
सांझी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें कोई बाज़ारू रंग या प्लास्टिक इस्तेमाल नहीं होता। सारी सामग्री घर और आसपास से मिल जाती है।
| सामग्री | किस काम आती है |
|---|---|
| गोबर | आकृति का आधार बनाने और हिस्सों को दीवार पर चिपकाने के लिए |
| मिट्टी (पीली और लाल) | चेहरा, तारे, चांद-सूरज जैसी आकृतियां ढालने के लिए |
| चूना | सफेद रंग और चमक के लिए |
| कालिख | काले रंग, आंखों और बारीक रेखाओं के लिए |
| हल्दी, आटा, फूल-पत्तियां | सजावट और रंग भरने के लिए |
| मिट्टी के बर्तन और जौ | पहले दिन जौ बोने के लिए, जो दशहरे पर विसर्जित होते हैं |
सांझी कैसे बनाई जाती है: चरण-दर-चरण
अलग-अलग गांवों में तरीका थोड़ा बदल सकता है, लेकिन मूल प्रक्रिया लगभग एक जैसी रहती है।
- दीवार चुनना: नवरात्रि के पहले दिन आंगन या घर की किसी साफ़ दीवार को चुना जाता है और उसे गोबर से लीपा जाता है।
- आकृतियां ढालना: मिट्टी से देवी का चेहरा, हाथ-पैर, गहने, तारे, चांद और सूरज जैसी छोटी आकृतियां बनाई जाती हैं। कई जगह स्थानीय कुम्हार ये हिस्से ढालकर देते हैं।
- सुखाना और रंगना: सूखने के बाद इन्हें चूने, कालिख और रंगीन मिट्टी से रंगा जाता है।
- दीवार पर सजाना: गोबर की मदद से सभी हिस्सों को दीवार पर जोड़कर पूरी सांझी तैयार की जाती है।
- जौ बोना: उसी दिन मिट्टी के बर्तनों में जौ बोए जाते हैं।
- शाम की पूजा: नौ दिनों तक हर शाम दीया जलाकर गीत और आरती होती है।
नौ दिनों की पूजा और दशहरे पर विसर्जन
नवरात्रि के दौरान हर शाम महिलाएं और लड़कियां सांझी के सामने इकट्ठा होती हैं। वे पारंपरिक सांझी गीत गाती हैं, भोग लगाती हैं और आरती करती हैं। इस तरह यह पूरा आयोजन मोहल्ले की महिलाओं को रोज़ एक साथ लाता है।
दशहरे के दिन सांझी को दीवार से सावधानी से उतारा जाता है। इसके बाद उसे एक बड़े मिट्टी के बर्तन में रखा जाता है, साथ में जलता दीया और उगे हुए जौ भी रखे जाते हैं। फिर इसे पास के तालाब, नहर या नदी में विसर्जित किया जाता है।
यह कला जानबूझकर अस्थायी होती है। हर साल नई सांझी बनती है और विसर्जित होती है, इसलिए इसे जीवन की नश्वरता का प्रतीक भी माना जाता है।
सांझी से जुड़ी मान्यताएं और सामाजिक महत्व
- अच्छे वर की कामना: परंपरागत रूप से अविवाहित लड़कियां अच्छे वर की कामना से सांझी माता की पूजा करती हैं।
- मन्नत: कई परिवार अपनी मनोकामना पूरी होने के लिए भी सांझी बनाते हैं।
- लोक गीतों की परंपरा: सांझी के गीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ते हैं, जिससे हरियाणवी लोकभाषा भी जीवित रहती है।
- सामुदायिक मेलजोल: रोज़ शाम की पूजा से मोहल्ले की महिलाओं और बच्चियों के बीच जुड़ाव बढ़ता है।
अलग-अलग क्षेत्रों में Sanjhi kala के रूप
सांझी केवल हरियाणा तक सीमित नहीं है। उत्तर भारत के कई हिस्सों में इसकी अलग-अलग परंपराएं मिलती हैं।
| क्षेत्र | सांझी का रूप |
|---|---|
| हरियाणा | नवरात्रि में दीवार पर गोबर-मिट्टी से सांझी माता, दशहरे पर विसर्जन |
| पंजाब | “नौराते” में सांझी माता की पूजा, जौ बोने और विसर्जन की परंपरा |
| ब्रज क्षेत्र (उत्तर प्रदेश) | राधा-कृष्ण से जुड़ी सांझी परंपरा; वैष्णव मंदिरों में यह एक विकसित कला के रूप में भी दिखती है |
| दिल्ली और राजस्थान के कुछ हिस्से | गांवों में गोबर और फूलों से सांझी बनाने की परंपरा |
सांझी कला आज: चुनौतियां और संरक्षण
गांवों में मिट्टी के घर कम होने और पक्की दीवारें बढ़ने से यह परंपरा पहले जितनी आम नहीं रही। इसके अलावा, शहरों में नई पीढ़ी तक इसके गीत और तरीके कम पहुंच पा रहे हैं।
फिर भी हरियाणा सरकार का कला एवं संस्कृति विभाग और कई लोक कलाकार इसे बचाने में लगे हैं। उदाहरण के लिए, रोहतक जैसे शहरों में सांझी उत्सव आयोजित किए गए हैं। पूरी तरह जैविक सामग्री से बनने के कारण सांझी को पर्यावरण के अनुकूल लोककला का अच्छा उदाहरण भी माना जाता है।
घर पर सांझी बनाते समय आम गलतियां
- प्लास्टिक या केमिकल रंग: विसर्जन पानी में होता है, इसलिए प्राकृतिक रंग ही इस्तेमाल करें।
- गीली मिट्टी पर रंग: आकृतियां पूरी सूखने के बाद ही रंगें, वरना रंग फैल जाता है।
- कमज़ोर जोड़: भारी हिस्सों को गोबर की पर्याप्त परत से चिपकाएं, ताकि नौ दिन तक टिके रहें।
- विसर्जन में कचरा: विसर्जन से पहले प्लास्टिक की कोई चीज़ साथ न रखें।
हरियाणा की लोक परंपराओं को और करीब से जानने के लिए हमारी संस्कृति श्रेणी देखें। हरियाणा के इतिहास में रुचि हो तो पानीपत के तीनों युद्धों की पूरी कहानी पढ़ें। और भी लेखों के लिए Newspoke होमपेज पर जाएं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
Sanjhi kala किस राज्य की लोककला है?
सांझी मुख्य रूप से हरियाणा की लोककला है। पंजाब, दिल्ली, ब्रज क्षेत्र और राजस्थान के कुछ हिस्सों में भी इसके रूप मिलते हैं।
सांझी कब बनाई जाती है?
सांझी शारदीय नवरात्रि के पहले दिन बनाई जाती है और दशहरे के दिन इसका विसर्जन होता है।
सांझी किस चीज़ से बनती है?
सांझी गोबर, मिट्टी, चूना, कालिख, रंगीन मिट्टी, हल्दी, आटा और फूल-पत्तियों जैसी प्राकृतिक चीज़ों से बनती है।
सांझी माता किसका रूप मानी जाती हैं?
सांझी माता को देवी दुर्गा या पार्वती का रूप माना जाता है।
सांझी का विसर्जन कैसे किया जाता है?
दशहरे पर सांझी को दीवार से उतारकर मिट्टी के बर्तन में दीये और जौ के साथ रखा जाता है और फिर तालाब, नहर या नदी में विसर्जित किया जाता है।
सांझी शब्द का अर्थ क्या है?
“सांझी” को “संध्या” यानी शाम से जुड़ा माना जाता है, क्योंकि इसकी पूजा और गीत शाम के समय होते हैं।
क्या सांझी कला पर्यावरण के अनुकूल है?
हां, यह पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक सामग्री से बनती है, इसलिए इसे पर्यावरण के अनुकूल लोककला माना जाता है।
आखिर में काम की बात
Sanjhi kala हमें याद दिलाती है कि लोक परंपराएं सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि कला, संगीत, सामुदायिक मेलजोल और प्रकृति के सम्मान का मेल हैं। अगर आपके घर में यह परंपरा रही है, तो इस नवरात्रि बच्चों के साथ प्राकृतिक सामग्री से एक छोटी सांझी बनाकर देखें – इससे परंपरा भी आगे बढ़ेगी और बच्चे अपनी जड़ों से भी जुड़ेंगे।